फिर मुट्ठी में मिट्टी दबाने से गांठ टूट जाए तो समझो खेत तैयार
मौसम के बदलते मिजाज और अल नीनो से निपटने की तैयारी में ही है समझदारी कहते हैं कि भारतीय खेती मानसून का जुआ है और यह बात मप्र के किसान भाइयों से बेहतर कोई नहीं समझ सकता।
किसान दिन-रात पसीना बहाकर खेत तैयार करता है, लेकिन अगर ऐन वक्त पर मौसम दगा दे जाए, तो पूरी मेहनत पर पानी फिर जाता है।
पिछले एक दशक में जलवायु परिवर्तन (क्लाइमेट चेंज) के कारण यह अनिश्चितता और ज्यादा बढ़ गई है। इस बार खरीफ सीजन पर ‘अल नीनों’ का साया है। इससे कहीं सूखा तो कहीं अचानक भारी बारिश का असंतुलन पैदा होता है।
ताजा वेदर अपडेट के मुताबिक, मप्र में मानसून 20 जून के बाद दक्षिण-पूर्वी हिस्से से प्रवेश कर सकता है। प्रदेश में करीब 40 प्रतिशत खेती वर्षा सबसे ज्यादा है।
ऐसे में मानसून की पर आधारित है। इसलिए यहां चिंता पहली फुहार पड़ते ही किसान बोनी के लिए ट्रैक्टर चालू न करें।
जब तक खेत में कम से कम 3 से 4 इंच अच्छी बारिश न हो जाए और मिट्टी भीतर तक गीली न हो जाए, तब तक खरीफ फसलों की बुवाई बिल्कुल न करें।
ऐसे में किसान को अब वैज्ञानिक तरीके से समझना होगा कि कौन सी मिट्टी कितने घंटे में बखरनी लायक होती है और फसल कब बोनी चाहिए।
मुट्ठी में मिट्टी दबाकर देखना इसका सबसे आसान परीक्षण है। अगर गांठ तुरंत टूट जाए तो समझ लीजिए अपना खेत बखरनी के लिए तैयार है।
दो समझादारी भरे कदम जोखिम को करेंगे कम
पहला कदम : एक ही किस्म की बुवाई से बचें : अल नीनो के प्रभाव वाले इस चुनौतीपूर्ण सीजन में जोखिम को न्यूनतम करने के लिए किसान भाई कभी भी पूरे खेत में केवल एक ही किस्म (वैरायटी) की बुवाई न करें।
यदि आप सोयाबीन या मक्का लगा रहे हैं, तो कम से कम दो अलग-अलग अवधियों की (एक जल्दी और एक मध्यम अवधि में पकने वाली) किस्मों का चयन कर अलग-अलग टुकड़ों में बोएं, ताकि यदि मानसून के ब्रेक के कारण कोई एक अवस्था प्रभावित हो, तो दूसरी से उत्पादन मिल सके।
दूसरा कदम : बीमा से फसल को दें क्त्तिीय सुरक्षा : मानसून की इस अनिश्चितता को देखते हुए बुवाई के तुरंत बाद प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के अंतर्गत अपनी फसल का बीमा जरूर कराएं, ताकि शुरुआती सूखा या सीजन के बीच में आने वाले लंबे सूखे (मिड-सीजन एडवर्सिटी) की स्थिति में आपको वित्तीय सुरक्षा कवच मिल सके।
संकट के इस दौर में मौसम विभाग के ‘दामिनी’ और ‘मेघदूत’ ऐप पर मिलने वाली स्थानीय चेतावनियों के आधार पर ही खेतों में कोई भी बड़ा निवेश या छिड़काव का निर्णय लें।
किसानों को खेत में ही रोकना होगा पानी का एक-एक कतरा
महाकौशल और पूर्वी मप्र के धान उत्पादक क्षेत्रों में खेतों के चारों तरफ मजबूत और ऊंची मेड़ें (बाँडिंग) बना लें।
यह मेड़ें बारिश के पानी को खेत से बाहर बहने से रोकेंगी और पानी सीधे जमीन के भीतर समाकर नमी को ब्लॉक कर देगा।
सोयाबीन, अरहर, मूंग और उड़द जैसी दलहनी फसलों को हमेशा ‘रिज-फरो’ (कुड़-नाली) पद्धति से बोएं।
इससे ज्यादा बारिश का पानी नालियों से निकल जाएगा और सूखे के दिनों में यही नालियां पौधों की जड़ों को नमी की सप्लायर बनेंगी।
जानिए आपके खेत की मिट्टी में कब तक टिकी रहेगी नमी
मप्र के बड़े हिस्से में पाई जाने वाली काली मिट्टी की पानी रोकने की क्षमता सबसे ज्यादा होती है। इस वजह से यदि एक बार अच्छी बारिश के बाद लंबा सूखा पड़ता है, तो काली मिट्टी अपने भीतर नमी को 15 से 20 दिनों तक आसानी से ब्लॉक करके रख सकती है, जिससे फसल तुरंत नहीं मुरझाती।
इसके उलट, दोमट मिट्टी में नमी रोकने की यह क्षमता मध्यम होती है, जो सूखे के दिनों में केवल 7 से 10 दिन ही फसल का साथ दे पाती है।
वहीं, रेतीली या हल्की मिट्टी बहुत जल्दी सूख जाती है; इसमें नमी महज 3 से 5 दिनों में ही गायब हो जाती है और फसल तुरंत संकट में आ जाती है।
किसान भाई खेत को समतल कराना न भूलें
सिंचाई के पानी का बूंद-बूंद इस्तेमाल करने के लिए खरीफ की बुवाई से ठीक पहले अपने खेत को पूरी तरह समतल करवाएं।
जब खेत पूरी तरह समतल होता है, तो पानी और खाद पूरे खेत में एक समान रूप से फैलते हैं, जिससे पानी की बर्बादी 20 से 30 प्रतिशत तक कम हो जाती है और फसल की बड़वार एक जैसी होती है।
अपने मोबाइल पर मौसम विभाग द्वारा जारी जिला स्तरीय कृषि मौसम परामर्श और ताजा वेदर बुलेटिन पर लगातार नजर रखें।
