साल 2026 में जून के शुरुआती 2 हफ्तों में करीब 40% कम बारिश हुई है। देश के 22 राज्यों में बहुत कम बाऱिश से सुखे का डर हैं और तापमान भी अधिक गया है.
इस गर्मी ने खेतों की नमी सोख ली है, जिससे खरीफ फसलों की बुवाई और सब्जियों के उत्पादन पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है.
ऐसी गंभीर स्थिति में कृषि वैज्ञानिकों ने सलाह दी है कि किसान बुवाई में जल्दबाजी न करें और कम समय वाली फसलों को चुनें.
सब्जियो में मल्चिंग और ड्रिप सिंचाई अपनाएं ताकि पानी की बचत हो.सब्जियों को लू से बचाने के लिए शाम को हल्की सिंचाई करें.
मिट्टी में जैविक खाद बढ़ाकर पानी रोकने की क्षमता बढ़ाएं और इस संकट से निपटने के लिए आधुनिक’क्लाइमेट-स्मार्ट खेती’का रास्ता अपनाएं.
साल 2026 में मौसम का मिजाज बेहद कड़ा और चिंताजनक रहा है.1 जून से लेकर 18 जून तक के शुरुआती हफ्तों में पूरे देश के भीतर करीब 40 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई है, जिससे चारों तरफ पानी की भारी कमी दिखाई दे रही है.
स्थिति इस कदर नाजुक है कि इस अवधि में जहां गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में सामान्य से 78 फीसदी कम पानी बरसा है, वहीं झारखंड में 70 प्रतिशत, बिहार में 40 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश में 24 प्रतिशत तक की कम बारिश हुई है .
देश के लगभग 22 राज्यों में सामान्य से बहुत कम बारिश होने के कारण किसानों की चिंताएं बेहद बढ़ गई हैं, जिसके चलते वर्तमान में देश का 48 प्रतिशत एरिया कम वर्षा और 24 फीसदी एरिया अत्यधिक कम वर्षा श्रेणी में है.
दूसरी तरफ, तापमान में बेतहाशा बढ़ोतरी ने न केवल खेतों की नमी को पूरी तरह सोख लिया है, बल्कि खरीफ फसलों की बुवाई के भविष्य पर भी एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है.
ऐसे में किसानों के सामने खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित होने और वर्तमान में खड़ी फसलों पर विपरीत असर पड़ने की गंभीर आशंका खड़ी हो गई है.
खरीफ की बुवाई में जल्दबाजी न करें
डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय प्रो. डॉ. एस.के. सिंह अनुसार अगर बारिश कम हो रही है, तो किसानों को खेती का पुराना तरीका बदलना होगा. सबसे जरूरी बात यह है कि बुवाई में बिल्कुल भी जल्दबाजी न करें.
जब तक अच्छी बारिश न हो जाए और मिट्टी के अंदर तक बढ़िया नमी न आ जाए, तब तक खेत में बीज न डालें.
इस साल धान, मक्का, अरहर और मूंग जैसी फसलों के लिए ऐसी वैरायटी को चुनें जो कम समय में तैयार हो जाएं और सूखा झेल सकें.
इससे फायदा यह होगा कि अगर मानसून जल्दी भी चला गया, तो आपकी फसल समय पर पककर सुरक्षित घर आ जाएगी.
कम बारिश मेे खाद डालने का सही तरीका
ड़ॉ एस.के. सिंह अनुसार कम पानी या सूखे के मौसम में खेतों में बहुत ज्यादा यूरिया या नाइट्रोजन डालने से बचना चाहिए।
जब मिट्टी में नमी कम होती है, तो ज्यादा खाद डालने से पौधे अंदर से झुलस जाते हैं.
इसलिए सबसे बेहतर उपाय यह है कि पहले अपने खेत की मिट्टी की जांच करवाएं और उसी के हिसाब से खाद को एक बार में न डालकर, अलग-अलग टुकड़ों या किश्तों में दें।बेहतर होगा कि खाद को मिट्टी की जांच के आधार पर टुकड़ों में दें.
सब्जियों पर हीट वेव का कहर
अप्रैल से जून के बीच जब तापमान 45 से 48 डिग्री तक पहुँच जाता है, तो हरी सब्जियों को बहुत नुकसान होता है.
टमाटर, मिर्च, बैंगन, खीरा और लौकी जैसी फसलें इतनी तेज गर्मी बर्दाश्त नहीं कर पातीं, जिससे उनकी पैदावार आधे से भी कम हो जाती है.
तेज लू के कारण फूल और छोटे फल समय से पहले ही झड़ जाते हैं. इससे बचने के लिए शाम के समय खेतों में हल्की और लगातार सिंचाई करें.
साथ ही, पौधों पर ‘काओलिन’ जैसी दवा का छिड़काव करें जो पत्तियों के तापमान को काबू में रखती है.
इस मौसम में थ्रिप्स और सफेद मक्खी जैसे कीड़ों का हमला भी बढ़ जाता है, इसलिए खेत की लगातार देखभाल करते रहें.
अपनाएं क्लाइमेट-स्मार्ट खेती
बदलते मौसम में अगर खेती को बचाना है, तो मिट्टी की सेहत सुधारना सबसे ज्यादा जरूरी है. जिस जमीन में ‘मृदा कार्बनिक कार्बन’ अच्छा होता है, उसकी पानी सोखने की क्षमता 30 फीसदी तक बढ़ जाती है.
इसके लिए खेतों में हरी खाद जैसे ढैंचा या सनई पलटें, गोबर की खाद और वर्मी कंपोस्टका खूब इस्तेमाल करें.फसल कटने के बाद बचे हुए हिस्से को खेत में कभी न जलाएं.
आने वाला समय ‘क्लाइमेट-स्मार्ट खेती’ यानी मौसम के मिजाज को समझकर की जाने वाली आधुनिक खेती का है, जिससे कम पानी में भी अच्छी फसल ली जा सके.
