टिकाऊ खेती अपनाने पर 2,550 किसानों को मिले 15,000 रुपए

कार्बन क्रेडिट से किसानों की नई कमाई शुरू

पंजाब-हरियाणा के 2,550 किसानों को पुनर्योजी खेती (Regenerative Agriculture) से बने कार्बन क्रेडिट के लिए डिजिटल भुगतान शुरू हुआ।

पहले चरण में किसानों को करीब ₹3,000 से ₹15,000 मिले। जानें किसान कार्बन क्रेडिट से कैसे कमा रहे हैं।

खेती में पानी बचाने, मिट्टी की सेहत सुधारने और फसल अवशेष नहीं जलाने जैसे काम अब किसानों के लिए अतिरिक्त कमाई का जरिया भी बन रहे हैं।

पंजाब और हरियाणा के 2,550 किसानों के लिए कृषि कार्बन क्रेडिट के बदले प्रत्यक्ष डिजिटल भुगतान की शुरुआत की गई है।

लुधियाना स्थित पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) में आयोजित कार्यक्रम में कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के सचिव और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट ने किसानों के लिए प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) की शुरुआत की।

पहले भुगतान में शामिल किसानों को उनके खेतों से उत्पन्न कार्बन क्रेडिट में हिस्सेदारी के आधार पर करीब ₹3,000 से ₹15,000 तक मिले हैं।

यह पहल दिखाती है कि पर्यावरण के लिए लाभकारी कृषि पद्धतियों को वैज्ञानिक तरीके से मापकर किसानों के लिए अतिरिक्त आय से कैसे जोड़ा जा सकता है।

 

किसानों को ₹3,000 से ₹15,000 तक का भुगतान

पहले भुगतान चरण में करीब 30 हजार एकड़ कृषि भूमि और 50 हजार से अधिक कार्बन क्रेडिट शामिल किए गए। इसमें भाग लेने वाले किसानों को उनके हिस्से के अनुसार लगभग ₹3,000 से ₹15,000 तक का भुगतान किया गया।

भुगतान ग्रो इंडिगो के किसान कार्बन कार्यक्रम ‘आदि’ का हिस्सा है, जिसकी शुरुआत वर्ष 2019 में ICAR की तकनीकी सहायता से हुई थी।

महत्वपूर्ण बात यह है कि यह राशि कोई सामान्य सरकारी कृषि सब्सिडी नहीं है। यह संबंधित कार्यक्रम के तहत किसानों द्वारा अपनाई गई सत्यापित कृषि पद्धतियों से उत्पन्न कार्बन क्रेडिट से जुड़ा भुगतान है।

 

किन किसानों को मिला कार्बन क्रेडिट का पैसा?

कार्यक्रम में वर्ष 2019 से 2022 के बीच शामिल खेतों पर किसानों द्वारा पुनर्योजी कृषि के विभिन्न तरीके अपनाए गए थे। इनमें प्रमुख रूप से:

  • डायरेक्ट सीडेड राइस (Direct Seeded Rice – DSR) यानी सीधे धान की बुवाई
  • कम जुताई (Zero/Reduced Tillage)
  • फसल अवशेषों का बेहतर प्रबंधन
  • मिट्टी की सेहत सुधारने वाली कृषि पद्धतियां
  • पानी का बेहतर इस्तेमाल शामिल हैं।

इन गतिविधियों से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में आई कमी और मिट्टी में कार्बन की मात्रा में हुए बदलाव को मापने और स्वतंत्र सत्यापन के बाद कार्बन क्रेडिट जारी किए गए।

 

कार्बन क्रेडिट से किसान कैसे कमा रहे हैं?

इस व्यवस्था में किसानों के खेतों पर अपनाई गई जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियों के पर्यावरणीय प्रभाव को वैज्ञानिक रूप से मापा जाता है। निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी अथवा मिट्टी में कार्बन बढ़ने जैसे परिणामों के आधार पर कार्बन क्रेडिट तैयार किए जाते हैं। किसानों को उनके खेतों से बने कार्बन क्रेडिट में उनके हिस्से के अनुसार भुगतान मिलता है। इस कार्यक्रम के कार्बन क्रेडिट Verra VM0042 methodology के तहत जारी किए गए हैं।

 

किसानों के सामने रखे गए भुगतान के 2 विकल्प

कार्यक्रम में किसानों को भुगतान के लिए दो विकल्प उपलब्ध कराए गए

  • पहले विकल्प में किसान कार्बन क्रेडिट की बिक्री से पहले ही सुनिश्चित शुरुआती भुगतान ले सकते थे।
  • दूसरे विकल्प में किसान क्रेडिट की बिक्री पूरी होने के बाद मिलने वाले नेट कार्बन रेवेन्यू का 75 प्रतिशत हिस्सा चुन सकते थे।

ग्रो इंडिगो ने पहले विकल्प को चुनने वाले किसानों को क्रेडिट पूरी तरह बिकने का इंतजार कराने के बजाय अपने फंड से डिजिटल भुगतान किया।

 

1 लाख से ज्यादा किसान और 20 लाख एकड़ से अधिक क्षेत्र

कार्बन कार्यक्रम अब पंजाब और हरियाणा तक सीमित नहीं है। दी गई जानकारी के मुताबिक यह कार्यक्रम 7 राज्यों में 20 लाख एकड़ से अधिक कृषि भूमि और 1 लाख से ज्यादा किसानों तक पहुंच चुका है। हालांकि मौजूदा भुगतान पंजाब और हरियाणा के 2,550 किसानों के लिए शुरू किया गया है। वर्ष 2022 के बाद कार्यक्रम से जुड़े किसान अगले निगरानी चक्र का हिस्सा हैं। उनके कार्बन क्रेडिट जारी होने के बाद उन्हें भुगतान मिलेगा।

 

45 अरब लीटर पानी बचाने का अनुमान

कार्यक्रम के अनुसार 2019 से 2022 के बीच शामिल खेतों में अपनाए गए कृषि तरीकों से लगभग 45 बिलियन यानी 45 अरब लीटर पानी की बचत होने का अनुमान लगाया गया है। इसमें डायरेक्ट सीडेड राइस यानी DSR की महत्वपूर्ण भूमिका बताई गई है। पारंपरिक तरीके से धान की रोपाई की तुलना में सीधे बीज बोकर धान उगाने पर सिंचाई की जरूरत कम हो सकती है। इससे धान उत्पादक क्षेत्रों में भूजल पर पड़ने वाले दबाव को कम करने में भी मदद मिल सकती है।

 

2 लाख टन से ज्यादा फसल अवशेष जलने से बचाने का अनुमान

कार्यक्रम के तहत बेहतर फसल अवशेष प्रबंधन को भी बढ़ावा दिया गया है। इसके अनुसार करीब 2 लाख टन से अधिक फसल अवशेषों को जलने से बचाया गया। इसके परिणामस्वरूप अनुमानित 1,000 टन PM2.5 उत्सर्जन को रोकने में मदद मिलने का दावा किया गया है।

इस तरह किसानों को कार्बन भुगतान देने का मॉडल अतिरिक्त आय के साथ पानी की बचत, पराली प्रबंधन, मिट्टी की सेहत और वायु गुणवत्ता जैसे मुद्दों से भी जुड़ा है।

 

पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं में बड़ी गिरावट

सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025 के धान कटाई सीजन में पंजाब में 5,114 खेत आग की घटनाएं दर्ज हुईं। यह 2021 की तुलना में 93 प्रतिशत और 2022 की तुलना में 90 प्रतिशत कम बताई गई हैं।

मोगा जिले का रानसिंह कलां गांव भी फसल अवशेष प्रबंधन का उदाहरण है। गांव में लगातार छह वर्षों तक करीब 1,310 एकड़ क्षेत्र में फसल अवशेष नहीं जलाने का रिकॉर्ड बनाए रखने की जानकारी दी गई है।

 

ICAR की वैज्ञानिक मदद से हो रहा कार्बन का आकलन

कृषि कार्बन क्रेडिट तैयार करना केवल किसान द्वारा किसी नई तकनीक को अपनाने भर पर आधारित नहीं है। इसके लिए वैज्ञानिक माप और सत्यापन की प्रक्रिया भी होती है। ICAR संस्थानों ने कार्यक्रम में ग्रीनहाउस गैस अकाउंटिंग, क्रॉप सिमुलेशन मॉडलिंग, मिट्टी के नमूने, उपकरण सत्यापन, फील्ड टीम प्रशिक्षण तथा सैटेलाइट और रिमोट सेंसिंग जैसे क्षेत्रों में तकनीकी विशेषज्ञता उपलब्ध कराई है। ICAR-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI), नई दिल्ली ने भी इन प्रक्रियाओं में योगदान दिया है।

 

मिट्टी में जमा कार्बन भी बन सकता है किसानों की कमाई का जरिया

इस पहल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू खेती के पर्यावरणीय लाभ को आर्थिक मूल्य से जोड़ना है। यदि किसान ऐसी सत्यापित कृषि पद्धतियां अपनाते हैं जिनसे उत्सर्जन कम होता है अथवा मिट्टी में कार्बन संग्रह बढ़ता है, तो निर्धारित कार्बन कार्यक्रम के तहत उनसे कार्बन क्रेडिट तैयार किए जा सकते हैं।

हालांकि हर किसान को केवल DSR, कम जुताई या पराली न जलाने पर स्वतः ₹3,000 से ₹15,000 नहीं मिलेंगे। मौजूदा भुगतान संबंधित कार्बन कार्यक्रम में शामिल किसानों, उनके सत्यापित परिणामों और उनके हिस्से के कार्बन क्रेडिट से जुड़ा है।

इसलिए ₹3,000 से ₹15,000 की राशि को पूरे देश के किसानों के लिए तय सरकारी भुगतान या निश्चित प्रति एकड़ दर के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।