फसल को सिर्फ टॉनिक नहीं, संपूर्ण डाइट की जरूरत; 4आर सिद्धांत अपनाएं किसान
मध्य प्रदेश के ज्यादातर किसान भाई फसल पोषण को सिर्फ यूरिया, डीएपी और पोटाश को ही महत्वपूर्ण मानते हैं, जबकि वैज्ञानिक दृष्टि से पौधों को अपने जीवन चक्र के लिए 17 जरूरी पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है।
इनमें कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन तो हवा और पानी से मिलते हैं, लेकिन शेष 15 तत्व मिट्टी या फोलियर स्प्रे (पत्तियों पर छिड़काव) के माध्यम से देना जरूरी है।
इन पोषक तत्वों में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटैशियम जैसे प्रमुख तत्व, कैल्शियम, सल्फर, मैग्नीशियम जैसे गौण तत्व और आयरन, जिंक, बोरॉन, कॉपर जैसे सूक्ष्म तत्व शामिल हैं। इनकी कमी से पौधे की वृद्धि रुक जाती है, पत्तियां पीली पड़ती हैं और उपज प्रभावित होती है।
इसलिए मिट्टी परीक्षण के आधार पर समन्वित पोषक तत्व प्रबंधन (इनम) अपनाना अब टिकाऊ खेती की सबसे जरूरी शर्त बन गया है।
किसान द्वारा ‘चार आर’ के सिद्धांतों का पालन करने पर फसल की उत्पादकता 20-25% तक बढ़ जाती है और उर्वरक की लागत घटती है।
उर्वरकों की खपत कम होने से सीधे खेती की इनपुट लागत कम होती है। इसके साथ ही फसल को संपूर्ण डाइट मिलने से अंतिम उत्पादन में 15 से 25% तक की स्थिर बढ़ोतरी दर्ज की जाती है।
फसल में पोषक तत्वों की कमी के संकेत
- नाइट्रोजन की कमी : पौधे की पुरानी पत्तियों में पीलापन दिखाई देने लगता है। इससे पौधों में वृद्धि धीमी होती है।
- फॉस्फोरस की कमी : पौधे की पत्तियां असामान्य रूप से गहरी हरी या बैंगनी रंग की होने लगती हैं। जड़ें बेहद कमजोर होने से वे मिट्टी से पोषण नहीं खींच पाते।
- पॉटैशियम की कमी : नई पत्तियों के किनारे सूखने या झुलसे हुए दिखाई देने लगते हैं। पोटाश न मिलने से पौधों की रोग और कीट प्रतिरोधकता क्षमता घट जाती है।
- कैल्शियम की कमी : इसके प्रभाव से त्र से पौधे के ऊपरी हिस्से की नई कलियों में विकृति आ जाती है, वे मुड़ने लगती हैं।
पोषक तत्व प्रबंधन के तीन मजबूत सहारे
- रासायनिक उर्वरक : ये फसल को तुरंत ताकत देते हैं। जब शुरुआती दिनों में पौधों को जल्दी बढ़ने या हरी पत्तियां बनाने की सख्त जरूरत होती है, तब उर्वरक रामबाण काम करते हैं।
- जैविक खादें : अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर खाद, केंचुआ कंपोस्ट और हरी खाद मिट्टी की अंदरूनी बनावट को सुधारती हैं। ये जमीन में नमी सोखने की क्षमता को बढ़ाती हैं। इनका असर धीमा पर दीर्घकालिक होता है।
- बायो-फर्टिलाइजर : राइजोबियम, पीएसबी व एजोटोबैक्टर जैसे सूक्ष्मजीव सूक्ष्मजीव मिट्टी मिट्टी में में पड़े पड़े हुए अघुलनशील तत्वों को घोल कर पौधों के लिए सुलभ बनाते हैं। ये मिट्टी को जिंदा रखते हैं।
चार आर (4आर) सिद्धांत से करें संतुलित पोषण
- सही स्रोत (राइट सोर्स) : अपने खेत की मिट्टी की स्थिति और बोई जाने वाली फसल की आवश्यकता के अनुसार ही सही पोषक तत्व (खाद) का चुनाव करें।
- सही दर (राइट रेट) : मिट्टी परीक्षण रिपोर्ट के आधार पर फसल की जरूरत के अनुसार सटीक मापी गई मात्रा में ही खाद दें, मनमर्जी से ज्यादा खाद न डालें।
- सही समय (राइट टाइम) : फसल के जीवन चक्र की अवस्थाओं, जैसे बुवाई के समय, कल्ले (टिल्लर) बनते समय और फूल आने के प्रारंभिक चरण पर ही खाद दें।
- सही स्थान (राइट प्लेस) : उर्वरकों को खुले में बिखेरने के बजाय पौधों की जड़ के पास या मिट्टी में गहराई पर स्थापित करें, ताकि हवा या पानी से उसका ह्रास न हो।
फसल में पोटाश देने का नियम
सोयाबीन में तेल की मात्रा बढ़ाने के लिए सल्फर और मक्के के दानों में चमक लाने के लिए जिंक बेहद जरूरी है। सोयाबीन की फसल में डीएपी न मिलने की दशा में बुवाई के समय प्रति एकड़ 10 किलो से अधिक यूरिया का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
धान की फसल को जिंक का उपयोग जानलेवा ‘खैरा रोग’ से पूरी तरह बचाता है। पोटाश का सही इस्तेमाल दानों में चमक बढ़ाने के साथ फसल को सूखे और बीमारियों से लड़ने की ताकत देता है।
पोटाश को एक बार में डालने के बजाय धान और मक्के की फसल में 3 टुकड़ों (स्प्लिट डोज) में देना चाहिए। धान के खेत की मिट्टी को एक बार हल्का सूखा, फिर गीला और फिर सूखा करने से पोटैशियम जैसे तत्वों की उपलब्धता पौधों के लिए बहुत बढ़ जाती है और उपज में वृद्धि होती है।
