मालवी आलू को मिला जीआई टैग, खासियत : मिठास और स्टार्च कम

चिप्स-फ्रेंच फ्राइज सफेद ही रहते हैं

मिली अंतरराष्ट्रीय पहचान, 35 हजार किसान करते हैं 45 हजार हेक्टेयर में इस आलू की खेती मालवी आलू को लंबे इंतजार के बाद भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग मिल गया है।

अब इसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग पहचान मिल सकेगी और निर्यात को भी बढ़ावा मिलेगा।

इंदौर जिले में करीब 45 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में आलू की खेती होती है। प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से 30 से 35 हजार किसान इससे जुड़े हैं।

इसके अलावा मालवा के गराड़, मांडू की इमली (खुरासानी इमली) और रतलाम के सैलाना की बालम ककड़ी को भी जीआई टैग मिला है।

खास बात यह है कि आलू इंदौर के एक जिला-एक उत्पाद की भी प्रमुख फसल है।

इंदौर और मालवा क्षेत्र की जलवायु, उपजाऊ काली मिट्टी के कारण आलू की गुणवत्ता बेहतर है।

उप संचालक उद्यान त्रिलोकचंद्र वास्कले के अनुसार इसकी सबसे बड़ी विशेषता कम मिठास (शर्करा) और कम स्टार्च होना है।

इसी कारण चिप्स और फ्रेंच फ्राइज तलने के बाद काले या लाल नहीं पड़ते, रंग सफेद बना रहता है।

 

निर्यात के रास्ते खुलेंगे

जीआई मैन ऑफ इंडिया और पद्मश्री से सम्मानित डॉ. रजनीकांत ने भास्कर को बताया कि जीआई टैग मिलने के बाद इंदौरी मालवी आलू की ब्रांड वैल्यू बढ़ेगी।

इससे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में मांग बढ़ने की संभावना है। निर्यात के नए अवसर खुलेंगे। किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य मिल सकेगा।