जैविक हल्दी की खेती, मुनाफे के साथ दवा भी

भिण्डः प्रति एकड़ तीन लाख रुपए तक कमा रहे

शहर से सटे दबोहा में किसान राजीव शर्मा ने चार साल पहले परंपरागत सरसों और गेहूं की खेती से हटकर अदरक की खेती का प्रयोग किया, लेकिन असफल हो गए।

ऐसे में उन्हें उद्यानिकी विभाग की ओर से कच्ची हल्दी की खेती के लिए प्रेरित किया गया।

पर्याप्त जमीन, सिंचाई की सुविधा होने से वे खेती करने को राजी हो गए। तीन साल से वे यह खेती कर रहे हैं।

प्रति एकड़ एक लाख रुपए की लागत लगाकर वे प्रति एकड़ तीन लाख रुपए तक कमा रहे हैं।

किसान शर्मा बताते हैं कि कच्ची हल्दी की खेती का एक और फायदा है कि यह अमरूद के पेड़ों के नीचे भी हो जाती है।

अरहर के खेत में भी इसकी खेती की जा सकती है। अच्छां प्रतिसाद मिलने की वजह से वे अपने परिवार के अन्य लोगों के खेत किराए पर लेकर भी यह खेती करने वाले हैं।

 

औषधीय गुणों से भरपूर, यहीं मार्केट

राजीव शर्मा कच्ची हल्दी के अलावा देशी तरीके से प्रोसेसिंग कर सुखाकर सूखी हल्दी की गांठें भी बेचते हैं। कच्ची हल्दी के अचार की भी मांग है।

कच्ची हल्दी में रोग प्रतिरोधक क्षमता करक्यूमिन की वजह से होती है। अन्य एंटीऑक्सीडेंट संक्रमण से लड़ने और इम्यूनिटी बढ़ाते हैं।

एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों के कारण, यह अर्थराइटिस और जोड़ों की सूजन में प्रभावी है। एंटी वायरल और एंटी बैक्टीरियल होने से सर्दी-खांसी, खरास को ठीक करती है।

पाचन एंजाइमों को सक्रिय कर पेट की सूजन, गैस और अपच को कम करती है।