मप्र उपार्जित गेहूं, चना, ज्वार एवं बाजरा निस्तारण नीति- 2026 को मिली स्वीकृति
इस योजना के लागू होने से सरकार को बैंकों का ब्याज, परिवहन, भंडारण आदि पर होने वाला खर्च भी बच सकेगा
मुख्यमंत्री स्कूटी योजना को 2031 तक निरंतर रखे जाने के लिए 495 करोड़ की मंजूरी
भावांतर योजना की राशि किसानों के बैंक खातों में सीधे दी जाएगी
राज्य सरकार गेहूं, धान, ज्वार व बाजरा खरीदी के लिए नई नीति बनाने जा रही है। इस नीति से प्रदेश के करीब 80 लाख किसानों को तो लाभ होगा ही साथ में सरकार को बेवजह की क्षति से निजात मिल जाएगी।
कैबिनेट ने बुधवार को मप्र उपार्जित गेहूं, चना, ज्वार एवं बाजरा निस्तारण नीति-2026 को मंजूरी दी है। इसमें सरकार किसानों को भावांतर योजना का लाभ देगी।
भावांतर योजना की राशि किसानों के बैंक खातों में सीधे दी जाएगी। इसके लिए मुख्य सचिव की अध्यक्षता में गठित राज्य स्तरीय कमेटी को अधीकृत किया गया है।
इस योजना के लागू होने से सरकार को बैंकों का ब्याज, परिवहन, भंडारण आदि पर होने वाला खर्च भी बच सकेगा।
सीएम डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में मंत्रालय में हुई। खाद्य मंत्री गोविंद सिंह राजपूत ने इससे होने वाली क्षति आदि के बारे में मुख्यमंत्री डॉ. यादव को अवगत कराया।
कैबिनेट ने शासकीय हायर सेकंडरी स्कूलों में प्रथम स्थान पाने वाली बालिकाओं एवं बालक को मुख्यमंत्री स्कूटी योजना वित्तीय वर्ष 2026-27 से 2030-2031 तक निरंतरता की राशि 495 करोड़ की स्वीकृति प्रदान की है।
राज्य स्तरीय कमेटी उपार्जन पर लेगी निर्णय
कैबिनेट में लिए गए निर्णय के बारे में मंत्री चैतन्य काश्यप ने बताया कि इस नीति के अनुसार एक राज्य स्तरीय कमेटी मुख्य सचिव की अध्यक्षता में गठित होगी।
समिति की ओर से उपज के मात्रा निर्धारण के बाद प्रस्तावित उक्त मात्रा विक्रय करने के पूर्व रिजर्व प्राइज अपसेट मूल्य तय करना एवं ई-निविदा/ई-ऑक्शन प्रक्रिया के माध्यम से दरें आमंत्रित करना, दरों के परीक्षण के बाद अनुमोदन की कार्रवाई का अनुमोदन किया जाएगा।
गेहूं व धान के साथ ही ज्वार व बाजरा की खरीदी का भी अनुमोदन करेगी।
अभी ये हाल है?
- गेहूं व धान पर ही सरकार को 30 हजार करोड़ रुपए का ऋण लेना पड़ा
- इसका 48 करोड़ रुपए से ज्यादा का ब्याज हर महीने देना पड़ रहा
- केंद्र सरकार की स्वीकृति के बाद ही मप्र सरकार की गारंटी पर बैंकों से 30 हजार करोड़ रुपए का ऋण लेकर गेहूं व धान की खरीदी की गई
इसलिए, लाई राज्य सरकार यह नीति ?
गेहूं व धान के उपार्जन में सबसे बड़ा तथ्य यह है कि केंद्र सरकार महज 25 से 30 लाख मीट्रिक टन गेहूं का ही उठाव कराना है।
बाकी गेहूं खुले बाजार में उपार्जन लागत से काफी कम कीमत पर बेचना होता है। इससे सरकार को काफी नुकसान उठाना पड़ता है।
इस रबी वर्ष में एक करोड़ मीट्रिक टन से ज्यादा गेहूं की खरीदी हुई है। धान की खरीदी भी 51 लाख मीट्रिक टन हुई।
धान करीब 65 फीसदी चावल निकलता है। इसे भी केंद्र सरकार लेती है।
एक बड़ा पेंच यह है कि केंद्र सरकार धान व चावल का उठाव सीजन में नहीं करती, जब उसे जरूरत होती है, उसी समय कराती है। इससे भंडारण व क्षतिपूर्ति का खर्च मप्र सरकार को वहन करना पड़ता है।
करीब 10 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा की राशि प्रति वर्ष राज्य सरकार को खर्च करनी पड़ रही है।
