रासायनिक खाद से दूरी बनाकर किसान ने अपनाई नई तकनीक, बढ़ा रहे मिट्टी की उर्वरता

छत्तीसगढ़ में जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए किसान अब नील-हरित शैवाल (ब्लू-ग्रीन एल्गी) को अपना रहे हैं। कृषि विभाग के मार्गदर्शन में किसान मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और खेती की लागत कम करने की दिशा में नई पहल कर रहे हैं।

टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल खेती को बढ़ावा देने के लिए प्रदेश के किसान पारंपरिक रासायनिक तरीकों से हटकर जैविक और प्राकृतिक खेती की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं।

इस दिशा में नील-हरित शैवाल एक प्रभावी तकनीक के रूप में उभरकर सामने आई है, जो मिट्टी में प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन की पूर्ति कर उसकी उर्वरता बढ़ाने में मदद करती है।

प्रदेश के कई प्रगतिशील किसान अब मिट्टी परीक्षण के आधार पर वैज्ञानिक खेती को अपनाते हुए जैविक उपायों का उपयोग कर रहे हैं।

सरगुजा जिले के किसान धनेश्वर प्रसाद इसका उदाहरण हैं, जिन्होंने कृषि विभाग के तकनीकी मार्गदर्शन में नील-हरित शैवाल आधारित खेती को अपनाया है।

मिट्टी में नाइट्रोजन की कमी पाए जाने के बाद उन्होंने स्वयं इस तकनीक का उपयोग शुरू किया, जिससे खेतों को प्राकृतिक पोषण मिलने लगा और उत्पादन में सुधार की दिशा में सकारात्मक परिणाम सामने आए।

 

रासायनिक खादों से दूरी बनाकर बने प्रेरणास्रोत

खेती में रासायनिक खादों के लगातार उपयोग से मिट्टी की घटती उर्वरता के बीच अम्बिकापुर विकासखंड के ग्राम लब्जी (नावापारा) के किसान धनेश्वर प्रसाद ने एक नई दिशा दिखाई है।

6 एकड़ भूमि पर खेती करने वाले धनेश्वर अब पूरी तरह जैविक खेती की ओर अग्रसर हो चुके हैं और क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए प्रेरणा बन रहे हैं।

 

कृषि विभाग के मार्गदर्शन से मिली नई दिशा

धनेश्वर प्रसाद बताते हैं कि पहले वे अपनी खेती में केवल रासायनिक खादों का उपयोग करते थे, जिससे हर साल खाद की मात्रा बढ़ती जा रही थी और जमीन की उर्वरता घटती जा रही थी।

समस्या के समाधान के लिए उन्होंने कृषि विभाग से संपर्क कर मिट्टी परीक्षण कराया, जिसमें नाइट्रोजन की कमी पाई गई। इसके बाद विभागीय अधिकारियों ने उन्हें मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए नील-हरित शैवाल (ब्लू-ग्रीन एल्गी) अपनाने की सलाह दी।

 

घर पर टैंक बनाकर शुरू किया उत्पादन

कृषि विभाग की सलाह पर अमल करते हुए धनेश्वर प्रसाद ने अपने घर की बाड़ी में एक विशेष टैंक बनाकर नील-हरित शैवाल का उत्पादन शुरू किया।

उनके अनुसार, इस टैंक से लगभग 25 किलो शैवाल तैयार होता है, जिसे खेतों में उपयोग करने से मिट्टी में प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन की पूर्ति होती है और भूमि की उर्वरता में सुधार होता है।

 

विशेषज्ञों की राय: धान की खेती के लिए वरदान है नील-हरित शैवाल

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, नील-हरित शैवाल (ब्लू-ग्रीन एल्गी) धान आधारित खेती में मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने का एक प्रभावी और किफायती जैविक विकल्प है।

  • प्राकृतिक नाइट्रोजन का स्रोत: इसके उपयोग से मिट्टी में नाइट्रोजन की उपलब्धता प्राकृतिक रूप से बढ़ती है, जिससे फसल को आवश्यक पोषण मिलता है।
  • लागत में कमी: नील-हरित शैवाल के उपयोग से रासायनिक उर्वरकों, विशेषकर यूरिया, पर निर्भरता कम होती है और किसानों का खर्च घटता है।
  • दीर्घकालिक लाभ: यह तकनीक मिट्टी की जलधारण क्षमता और उत्पादकता को लंबे समय तक बनाए रखने में मदद करती है, जिससे खेती अधिक टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल बनती है।

 

भविष्य और स्वास्थ्य के लिए जरूरी है जैविक खेती

जैविक खेती के दीर्घकालिक लाभों पर जोर देते हुए किसान धनेश्वर प्रसाद ने कहा कि यह पहल केवल वर्तमान फसल तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य और उनके स्वास्थ्य से भी जुड़ी हुई है।

उनके अनुसार, जैविक खेती से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और आवश्यक पोषक तत्व सुरक्षित रहते हैं, जिससे फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों में सुधार होता है।

उन्होंने बताया कि मिट्टी का स्वास्थ्य बेहतर होने से उत्पादन की मात्रा के साथ-साथ उसकी गुणवत्ता भी बढ़ती है। साथ ही रासायनिक खादों के दुष्प्रभाव से होने वाली बीमारियों में कमी आती है और लोगों को शुद्ध एवं पौष्टिक भोजन मिल पाता है।

 

अन्य किसानों से ‘खेत बचाओ’ की अपील

धनेश्वर प्रसाद ने पर्यावरण संरक्षण और खेती को बचाने की इस पहल को व्यापक स्तर पर अपनाने की जरूरत बताई।

उन्होंने क्षेत्र के अन्य किसानों से भी अपील की कि वे रासायनिक खेती से दूरी बनाकर जैविक खेती अपनाएं, ताकि मिट्टी की सेहत सुधरे और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित किया जा सके।