पशुओं को दुग्ध ज्वर से इस तरह बचाएं, उत्पादन नहीं होगा कम

दुग्ध ज्वर अधिक दूध देने वाली विदेशी या संकर नस्ल की गायों व अधिक दूध देने वाली भैंसों में पाया जाता है।

यह मादा पशुओं के ब्याने के तुरंत बाद एक बार में सारा दूध या कोलोस्ट्रम निकाल लेने से कैल्शियम की कमी के कारण होता है।

इस रोग से प्रभावित पशु कांपने लगता है और वह बैठ जाता है। धीरे-धीरे पशु में बेहोशी आने लगती है। इलाज के अभाव में पशु की मृत्यु भी सकती है।

 

इस कारण होता है रोग

मुख्य रूप से यह रोग मादा पशुओं में कैल्शियम की कमी के कारण होता है। अधिक दूध देने वाली और बड़ी उम्र की मादाएं अधिक प्रभावित होती हैं।

गर्भावस्था में बच्चे की बढ़वार के लिए अधिक कैल्शियम की आवश्यकता होती है और ब्याने के बाद दूध में भी कैल्शियम निकलता है।

अचानक शरीर से बाहर सारा दूध निकालने से पशु का शरीर पशु आहार से कैल्शियम की पूर्ति नहीं कर पाता है और हड्डियों का कैल्शियम रक्त में आकर दूध निर्माण के काम आता है।

 

दिखाई देने लगते हैं लक्षण

इससे प्रभावित पशु के शरीर में कंपन होता है। मांसपेशियों में खिंचाव होता है। पशु जमीन पर बैठ जाता है और धीरे-धीरे लेटने की अवस्था में आ जाता है। मांसपेशिया ढीली हो जाती हैं। समय पर इलाज नहीं मिलने पर पशु की मृत्यु भी हो सकती है।

 

उपचार जरूरी

रोगी पशु को तुरंत कैल्शियम रक्त वाहिनी के माध्यम से दें। कैल्शियम का घोल पिलाया जा सकता है। इसके साथ ही विटामिन डी के इंजेक्शन भी लगाएं।

 

सेहत का रखें खयाल

बिगड़े मौसम में कई बीमारियां तेजी से फैलती हैं, जो दूध उत्पादन को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे में पशुपालकों को कुछ खास बातों का ध्यान रखना चाहिए।

नियमित टीकाकरण :

  • बीमारियों से बचाव के लिए पशुओं का समय पर टीकाकरण करवाएं।
  • कृमिनाशक दवाएं दें।
  • पशुशाला को साफ-सूखा रखें।
  • मक्खी-मच्छरों से बचाव के लिए पशुशाला में धुआं करें या कीटनाशक दवाओं का छिड़काव करें।

पौष्टिक आहार दें :

दूध निकालने से पहले अपने हाथों और पशु के थनों को अच्छी तरह साफ पानी से धोएं। इससे दूध की गुणवत्ता बनी रहेगी।

थनैला रोग जैसी बीमारियों से भी बचाव होगा। पशुशाला में हवा-रोशनी का उचित प्रबंध रखें। पौष्टिक आहार दें।