जबलपुर : वेटरनरी यूनिवर्सिटी की पहल से दूध उत्पादन बढ़ाने की नई उम्मीद, गोशालाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में कदम
मनुष्यों में उपयोग की जाने वाली आर्टिफिशियल इनसेमिनेशन (एआइ) तकनीक अब पशुधन विकास में भी नई संभावनाएं खोल रही है।
नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय (वेटरनरी यूनिवर्सिटी) के वैज्ञानिकों ने देशी गायों में कृत्रिम गर्भाधान और एंब्रियो ट्रांसफर तकनीक का सफल प्रयोग किया है।
इस उपलब्धि से गौशालाओं में मौजूद देशी पशुधन की गुणवत्ता सुधारने और दूध उत्पादन क्षमता बढ़ाने की दिशा में नई उम्मीद जगी है।
अब तक यह धारणा थी कि इस तकनीक का प्रभावी उपयोग केवल उच्च नस्ल के पशुओं में ही संभव है।
इसी भ्रांति को दूर करने के लिए विश्वविद्यालय ने विभिन्न गौशालाओं की देशी गायों को चयनित कर यह प्रयोग किया।
सफलता मिलने के बाद विश्वविद्यालय इस तकनीक को किसानों और डेयरी फार्मों तक पहुंचाने की तैयारी कर रहा है।
यह है तकनीक
कृत्रिम गर्भाधान ऐसी तकनीक हैं, जिसमें श्रेष्ठ नस्ल के पशुओं के वीर्य का उपयोग कर गायों को गर्भधारण कराया जाता है।
एंब्रियो ट्रांसफर तकनीक में उत्कृष्ट नस्ल की गाय से प्राप्त भ्रूण को दूसरी गाय के गर्भ में प्रत्यारोपित किया जाता है। इस तकनीक की मदद से कम समय में बड़ी संख्या में उन्नत नस्ल के पशु तैयार किए जा सकते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार दूध उत्पादन क्षमता बढ़ेगी, दूध की गुणवत्ता सुधरेगी, उत्पादन लागत घटेगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।
26 गायों पर प्रयोग
विवि के वैज्ञानिक डॉ. एपी सिंह ने बताया कि विभिन्न गौशालाओं से 26 देशी गायों का चयन किया गया। इनमें सुपर ओव्यूलेशन तकनीक के माध्यम से साहिवाल नस्ल के भ्रूण तैयार किए गए।
इस प्रयोग के परिणामस्वरूप अब तक 15 उच्च नस्ल के बछड़ों का सफल जन्म हो चुका है। यदि बड़े पैमाने पर इस तकनीक का उपयोग किया जाए तो प्रदेश में उन्नत नस्ल के पशुओं की संख्या तेजी से बढ़ाई जा सकती है।
नई उम्मीद जागी
डॉ. सिंह के अनुसार अब तक यह तकनीक मुख्य रूप से उच्च नस्ल के पशुओं तक सीमित थी, लेकिन देशी गोशालाओं की गायों में इसके सफल प्रयोग ने नई संभावनाएं पैदा की हैं।
यदि पशुपालकों और गोशाला संचालकों को जागरूक कर प्रशिक्षित किया जाए तो गोशालाएं भी आत्मनिर्भर बन सकेंगी। विवि प्रशासन का कहना है कि आगामी चरण में तकनीक का विस्तार किसानों, डेयरी फार्मों तक किया जाएगा।
हमारा उद्देश्य उन्नत नस्ल के पशुओं की संख्या बढ़ाकर दूध उत्पादन क्षमता में वृद्धि करना करना है। आने वाले समय में तकनीक को किसानों और डेयरी फार्मों तक पहुंचाया जाएगा, जिससे पशुपालकों को प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा।
डॉ. मनदीप शर्मा, कुलपति, वेटरनरी यूनिवर्सिटी, जबलपुर
