लखनऊ के किसान सुरेश की सफल कहानी
Lucknow Farmer Story: बीते दिनों एक घटनाक्रम को याद करते हुए सुरेश बताते हैं कि उनके अमरूद के बाग में पिछले दिनों कीड़े लग गए थे.
पौधे की जड़ में कीड़े लगने की वजह से तमाम पौधे सूखने लगे. यह बेहद चिंता की बात थी. सुरेश कुमार भी चितिंत थे.
उन्होंने उद्यान विभाग के तमाम वैज्ञानिकों से संपर्क किया. वैज्ञानिक उनकी बाग में आए और सभी ने केमिकल के जरिए कीड़ों को नष्ट करने की सलाह दी.
खेती अब मुनाफे का मजबूत जरिया बनती जा रही है. सही फसल का चयन, आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल और बाजार की अच्छी समझ से किसान मोटी कमाई कर सकते है. ऐसा ही कमाल उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के किसान सुरेश कुमार ने कर दिखाया है.
उन्होंने 2 एकड़ जमीन पर ताइवान पिंक अमरूद के बाग लगाकर लाखों कमा रहे हैं. लखनऊ के मखदूमपुर कैथी गांव निवासी प्रगतिशील किसान सुरेश कुमार ने बताया कि पिछले 5 सालों से ताइवानी पिंक अमरूद की जैविक खेती कर रहे हैं.
इस खेती के जरिए वह एक साल में 10-12 लाख रुपया का मुनाफा हो रहा है. यह अमरूद गुलाबी रंग का, ज्यादा मीठा और जल्दी पकने वाला होता है.
पहले करते थे मटर, धान और गेहूं की खेती
उन्होंने बताया कि अमरूद की खेती से हुई आमदनी से उन्होंने अपने बेटे रवि रावत को एनआईटी शिबपुर वेस्ट बंगाल से इंजीनियरिंग की पढ़ाई करा रहे है. उनका सपना है कि प्रदेश के हर किसान किसी न किसी रूप में जैविक खेती करें.
मखदूमपुर कैथी गांव निवासी सुरेश कुमार ने बताया कि इससे पहले मटर, धान और गेहूं की खेती करते थे. लेकिन अब ताइवान पिंक अमरूद की खेती कर रहे है, जहां ठीक-ठाक मुनाफा लागत निकालने के बाद एक साल में हो जाता है.
3.5 बीघा में अमरूद की खेती में किसी भी केमिकल का प्रयोग नहीं करते है. क्योंकि केमिकल युक्त खेती से जमीन बंजर हो जाती है, तो दूसरी तरफ फसल की पैदावार अच्छी नहीं होती.
एक एकड़ में 30-35 क्विंटल अमरूद का उत्पादन
उन्होंने आगे बताया कि एक एकड़ में ताइवान पिंक अमरूद 30-35 क्विंटल का उत्पादन हो जाता है. वहीं व्यापारी खेत पर फसल का सौदा कर लेते है.
एक किलो ताइवान पिंक अमरूद 60 रुपये की दर से बिक जाता हैं. सुरेश बताते हैं कि दिल्ली के एक किसान से इम्पोर्ट के जरिए ताइवान पिंक अमरूद के पौधों को मंगवाया था.
बीते दिनों एक घटनाक्रम को याद करते हुए सुरेश बताते हैं कि उनके अमरूद के बाग में पिछले दिनों कीड़े लग गए थे.पौधे की जड़ में कीड़े लगने की वजह से तमाम पौधे सूखने लगे.
यह बेहद चिंता की बात थी. सुरेश कुमार भी चितिंत थे. उन्होंने उद्यान विभाग के तमाम वैज्ञानिकों से संपर्क किया. वैज्ञानिक उनकी बाग में आए और सभी ने केमिकल के जरिए कीड़ों को नष्ट करने की सलाह दी.
जब उद्यान विभाग के वैज्ञानिक भी रह गए दंग…
यह भी बताया कि यदि कीड़ों को जल्द से जल्द नष्ट नहीं किया गया तो पूरी बाग खत्म हो जाएगी. वहीं कई सालों से बुना गया सपना टूट जाएगा, लेकिन सुरेश कुमार ने केमिकल का प्रयोग करने से मना कर दिया.
फिर उन्होंने चूना, मदार, गाय के मूत्र से जैविक तरल पदार्थ तैयार किया. उसे अमरूद के पौधों की जड़ों में डाला. इसका नतीजा रहा कि अमरूद के पौधे फिर से हरे होने लगे.
सुरेश कुमार बताते हैं कि जब उन्होंने अमरूद के पौधों के फिर से हरा भरा होने की सूचना कृषि और उद्यान विभाग के वैज्ञानिकों को दी तो वे उनकी बाग में आए और पौधे देखा.
अमरूद की जड़ को बचाने के तरीके पूछे. अब यही तरीके अन्य बागवानों को भी बताया जा रहा है.
पोषक तत्वों से भरपूर होता है ताइवान पिंक अमरूद
उन्होंने बताया कि उनके संपर्क में बाराबंकी, रायबरेली,लखनऊ सहित आसपास के तमाम जिलों के किसान हैं, जो अमरूद की जैविक खेती कर रहे हैं.
यदि उनके बाग में किसी तरह के कीड़ों का हमला होता है तो जैविक तरल पदार्थ का छिड़काव करते हैं. यह पूरी तरह से कारगर है. इस तरह उन्होंने अपनी बाग भी बचा लिया और जैविक खेती भी.
सुरेश ने बताया कि ताइवान पिंक अमरूद विटामिन ए, विटामिन सी और अन्य पोषक तत्वों से भरपूर होता है.
किसान बड़ी संख्या में ताइवान पिंक अमरूद की बागवानी से ज्यादा मुनाफा कमा सकते हैं. वहीं फल पर हमेशा बैगिंग यानी पेपर बैग का प्रयोग करना चाहिए.
बेटे ने तैयार किया कम लागत में छिड़काव की मशीन
सुरेश कुमार का बेटा रवि रावत इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है. वहीं खेती में पिता की मदद करने के लिए नया उपकरण तैयार किया है. उसने छोटे ट्रैक्टर में ही इनोवेशन करके स्प्रे मशीन तैयार किया है.
इस मशीन के जरिए बाग में पौधों की घुलाई और जैविक तरल पदार्थ का खिड़काव किया जाता है.
उन्होंने बताया कि उन्होंने ट्रैक्टर में अलग- अलग उपकरणों को जोड़ने के लिए कबाड़ से सामग्री इकट्ठा की. पीछे ड्रम रखने की जगह को बनाया.

अब स्थिति यह है कि इस नई मशीन से उन्होंने एक नया इनोवेशन कर दिया है. जहां विभिन्न तरह की कंपनियां चार से पांच लाख में यह मशीन तैयार कर रही हैं वहीं उन्होंने करीब एक लाख के अंदर ही इसे तैयार कर दिया है.
दूसरी सबसे खास बात यह है कि यह मशीन पूरी तरह से किसानों के मुताबिक है. जबकि यह छोटे खेत में भी प्रयोग की जा सकती है.
