आलू : कम हो रही उत्तरप्रदेश पर निर्भरता
आलू के लिए मध्यप्रदेश की निर्भरता उत्तरप्रदेश पर कम होती जा रही है। हमारे यहां के किसान परंपरागत फसलों के अलावा आलू की खेती भी करने लगे हैं।
इंदौर-उज्जैन संभाग सहित छिंदवाड़ा क्षेत्र में भी आलू की खेती की जाने लगी है। हालाकि किसानों का कहना है कि लागत ज्यादा और मजदूरों की कमी से रकबा तेजी से नहीं बढ़ रहा।
2024-25 में प्रदेश में आलू का रकबा बढ़कर 1.88 लाख हेक्टेयर हो गया है। यह प्रति वर्ष 5-6% की वृद्धि दिखाता है।
कृषि मामलों के जानकार अमरेन्द्र मिश्रा के अनुसार आधुनिक तकनीक से बुवाई की जाए तो 100 से 150 क्विंटल तक प्रति एकड़ पैदावार हो सकती है।
कंपनियों की मांग
- आलू से बड़ापाव,
- चाट,
- आलू भरी कचौड़ी,
- चिप्स,
- पापड़,
- फ्रेंचफ्राइस,
- समोसा,
- टिक्की के अलावा पकवान भी बनाए जाते हैं।
कंपनियां चिप्स आदि तैयार करती हैं। ज्यादातर कंपनियां सीधे खेतों से खरीदी करती हैं। उन्हें बाजार भाव से कम दर पर मिल जाता है।
शाजापुर, इंदौर, उज्जैन, धार, बड़वानी में आलू की खेती बढ़ रही है। गेहूं की तरह आलू की फसल भी 3-4 पानी में तैयार हो जाती है। जानकारों से सलाह लेकर बुवाई करें तो किसानों के लिए ये फसल फायदे का सौदा है।
डॉ. सुधीर धाकड़, वैज्ञानिक कृषि विज्ञान केंद्र, शाजापुर
प्रदेश की मिट्टी भारी
उत्तरप्रदेश में आलू की फसल बहुतायत से होती है। वहां हल्की एवं भुरभुरी मिट्टी में उत्पादन ज्यादा होता है।
मध्यप्रदेश में काली मिट्टी ज्यादा है, लेकिन आधुनिक तकनीक अपनाने और कृषि वैज्ञानिकों से जानकारी लेकर यहां के किसान भी आलू की अच्छी पैदावार लेने लगे हैं।
उचित मूल्य नहीं
किसान नेता बबलू जाधव का कहना है कि प्रदेश में आलू का रकबा तो बढ़ रहा है, लेकिन किसानों को उचित मूल्य नहीं मिल रहा।
बीज, खाद, कीटनाशक, सिंचाई, मजदूरी की बढ़ती लागत ने अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाल दिया है।
उनकी मांग है कि समर्थन मूल्य, भंडारण व्यवस्था, बाजार नियंत्रण जैसे ठोस कदम उठाए जाएं।
