अतिवृष्टि और सूखे की दिक्कत को खत्म करेगी खेती की रिज-फरो और वाइड बेड तकनीक

मौसम का मिजाज बदले तो बोनी का तरीका भी बदलना चाहिए

खरीफ सीजन में किसानों की पहली लड़ाई मानसून की अनिश्चितता से ही होती है

प्रदेश का मानसून अब वैसा भरोसेमंद नहीं रहा जैसा पहले कर हुआ करता था।

जलवायु परिवर्तन के इस दौर में मौसम का बर मिजाज ऐसा बदला है कि कभी तो महज 24 घंटे के भीतर 10 इंच मूसलाधार बारिश पूरे खेत को जलमग्न (डूबो) कर देती है, तो कभी बुवाई के बाद अचानक 20 से 25 दिनों का लंबा सूखा खड़ी फसल को पूरी तरह सुखा देता है।

इसके बावजूद सूबे के अधिकांश किसान आज भी ने पारंपरिक ‘सपाट बोनी’ पर ही निर्भर हैं। इस पारंपरिक की तरीके में फसल अतिवृष्टि और सूखे, दोनों ही विपरीत परिस्थितियों में सबसे पहले तबाही की चपेट में आती है।

ज्यादा बारिश होने पर पानी खेतों में जमा होकर पौधों की न, जड़ों को सड़ा देता है, और सूखा पड़ने पर मिट्टी की नमी रा गायब होते ही पौधे दम तोड़ देते हैं।

यदि इस खरीफ सीजन र में किसान आधुनिक जल प्रबंधन तकनीकों को अपना लें, तो प्रकृति की इस दोहरी मार से बचा जा सकता है।

 

ये होती है रिज-फरो पद्धति

मेड़-नाली विधि के तहत पूरे खेत को समतल रखने के बजाय ट्रैक्टर चालित विशेष यंत्र से ऊंची मेड़ें (रिज) और गहरी नालियां (फरो) बनाई जाती हैं।

इसमें मुख्य फसल के बीजों की बुवाई ढीली मिट्टी से बनी ऊंची मेड़ों के ऊपर की जाती है। इस पद्धति में फसल की प्रत्येक कतार (लाइन) से दूसरी कतार के बीच लगभग 30 सेंटीमीटर की मानक दूरी रखी रखी जाती है।

 

क्या होता है वाइड बेड सिस्टम ?

चौड़ी क्यारी-नाली पद्धति यानी वाइड बेड-फरो सिस्टम में खेत के भीतर 90 सेमी चौड़े और चपटे बेड (चौड़ी क्यारियां) बनाए जाते हैं।

इस चौड़े बेड के ऊपर फसल की कतारों के बीच 30 सेमी की दूरी रखी जाती है, जबकि दो अलग-अलग चौड़े बेड के बीच में 45 सेमी चौड़ी और 15 सेमी गहरी पक्की जल निकासी वाली नाली स्वतः निर्मित हो जाती है।

 

अतिवृष्टि और सूखे से ऐसे होगी सुरक्षा

अतिवृष्टि की स्थिति में : जब अत्यधिक बारिश होती है, तो अतिरिक्त पानी पौधों की जड़ों के पास मेड़ों पर ठहरने के बजाय तुरंत ढलान पाकर दोनों कतारों के बीच बनी गहरी नालियों में चला जाता है। इससे जलभराव नहीं होता।

सूखे के दौर में : बोनी के बाद जब बारिश का लंबा गैप आता है, तब यही नालियां नमी के प्राकृतिक बैंक के रूप में काम करती हैं। नालियों की गहराई में संचित रही नमी ‘केशिका क्रिया’ द्वारा धीरे-धीरे ऊपर मेड़ों की ओर रिसती रहती है।

 

चौड़ी क्यारी-नाली पद्धति के ये हैं लाभ

शानदार प्रकाश संश्लेषणा : पौधों की पूरी छतरी तक सूर्य किरणें गहराई तक और सीधे पहुंचती हैं। धूप और हवा का यह प्रवाह पौधों में प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया को तेज करता है, जिससे फसल का वानस्पतिक विकास उत्कृष्ट श्रेणी का होता है।

फसलों के लिए अनुकूलता : खरीफ मौसम की अत्यधिक वर्षा का पानी इन 15 सेमी गहरी नालियों के रास्ते बिना रुके खेत से बाहर निकल जाता है, जिससे जड़ों को वायुमंडल की नाइट्रोजन और ऑक्सीजन सुलभता से मिलती रहती है।

 

मशीन न मिल पाए तो ये करें किसान

हर किसान भाई के लिए एक ही सीजन में अपने खेत की पूरी तकनीक या बुवाई की मशीनें बदलना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं हो पाता।

ऐसे किसानों के लिए आसान, बिना लागत का और ‘जुगाड़’ तकनीक वाला उपाय सुझाया है, जिसे ‘अस्थायी नाली’ (डेड फरो) कहा जाता है।

यदि आपने अपने खेत में पारंपरिक तरीके से समतल बोनी कर दी है और फसल उगकर खड़ी हो चुकी है, तो भारी बारिश की आशंका को देखते हुए फसल के बीच में हर दो सीड ड्रिल (यानी 8 से 10 कतारों के बाद) की खाली जगह पर कल्टीवेटर के पिछले टाइन में थोड़ा वजन बांधकर या देसी हल चलाकर 8 से 10 इंच गहरी छोटी-छोटी नाली बना दें।

ध्यान रहे कि ये नालियां हमेशा खेत के ढलान की विपरीत दिशा में बनाई जानी चाहिए, ताकि पानी एक जगह जमा होकर वेग न पकड़े।

यह अस्थायी नालियां अतिवृष्टि के समय अतिरिक्त पानी को सोखकर मेड़ों की तरह काम करेंगी और जड़ों के पास जलजमाव को रोककर फसल का सड़ना पूरी तरह बंद कर देंगी।

 

10 हजार ने इस सुरक्षा कवच को आजमाया

पिछले कुछ वर्षों के दौरान विभिन्न कृषि विस्तार कार्यक्रमों, जैसे ‘सोयाबीन की टिकाऊ खेती’ के माध्यम से इन उन्नत प्रणालियों का व्यावहारिक प्रशिक्षण किसानों को दिया गया है।

इनमें से करीब 10 हजार किसान आज अपने खेतों में रिज-फरो या वाइड बेड पद्धति से ही बुवाई कर रहे हैं।

इस तकनीक को अपनाने से न केवल उनकी फसल पूरी तरह सुरक्षित रही, बल्कि प्रति एकड़ कुल पैदावार में भी 15 से 20 फीसदी तक की सीधी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।