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केवड़ा की खेती से मालामाल हो रहे हैं किसान

 

आप भी कर सकते हैं मोटी कमाई

 

औषधीय गुणों से भरपूर केवड़ा गठिया के रोग में बड़ा असरदार होता है.

 

इसकी पत्तियों से भी कई प्रकार की दवाई बनाई जाती है. व्यावसायिक इस्तेमाल कर भी लोग इससे धन कमाते हैं.

 

केवड़ा की खेती कर किसान मालामाल हो रहे हैं. केवड़ा एक बहु उपयोगी पौधा है. इससे कई तरह के उत्पादन बनते हैं. इस कारण इसकी मांग हमेशा बनी रहती है.

मांग के हिसाब से उत्पादन नहीं होने के कारण केवड़ा की खेती करने वालों को अच्छी कीमत मिलती है.

केवड़ा सामान्यत: नदी, नहर, खेत और तालाब के आसपास उगता है. इसके अलावा समुद्री किनारों पर इसकी फसल अच्छी होती है.

 

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केवड़ा की खेती में ज्यादा मेहनत नहीं करना पड़ता. इसके खेतों में खर-पतवार नहीं होते, इसलिए किसानों को निराई कराने की जरूरत नहीं पड़ती है.

अगर बारिश अच्छी हो रही हो तो सिंचाई की जरूरत भी नहीं पड़ती है. अच्छी वर्षा वाले क्षेत्र में ही इसकी खेती ज्यादातर होती है. वैसे भी केवड़ा जल स्रोत के आस-पास अपने आप उग जाता है.

 

किस-किस चीज में होता है उपयोग ?

केवड़ा से सौंदर्य प्रसाधन बनाए जाते हैं. इससे सुगंधित साबुन, केश तेल, लोशन, खाद्य पदार्थ और सीरप आदी में उपयोग होता है. सुंगध के लिए पेय पदार्थों में भी इसे डाला जाता है.

औषधीय गुणों से भरपूर केवड़ा गठिया के रोग में बड़ा असरदार होता है. इसकी पत्तियों से भी कई प्रकार की दवाई बनाई जाती है.

व्यावसायिक इस्तेमाल कर भी लोग इससे धन कमाते हैं. केवड़ा के रेशों से चटाई और टोकरी भी बनती है.

 

किस प्रकार के मिट्टी में होती है केवड़ा की खेती ?

केवड़ा खी खेती के लिए बलुअर दोमट मिट्टी और दोमट मिट्टी को काफी उपयुक्त माना जाता है. रेतीली, बंजर और दलदली मिट्टी में भी इसकी फसल अच्छी होती है.

अगर जल निकासी की सुविधा अच्छी हो तो इसकी पैदावार अच्छी होती है. इन मिट्टियों के अलावा, आम तौर पर ज्यादातर मिट्टियों में इसकी फसल हो जाती है.

 

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कब कर सकते हैं केवड़ा की खेती ?

केवड़ा की रोपाई जुलाई और अगस्त के महीने में की जाती है. सिंचाई के लिए साधन हो तो आप फरवरी-मार्च में भी इसकी खेती कर सकते हैं.

इसकी रोपाई से पहले खेत की अच्छे से जुताई करा कर पट्टा चला दें. इसके बाद पौधे को नर्सरी से लाकर खेत में बनाए गए गड्ढे में लगा दें. पौधों के बीच पर्याप्त दूरी रखना जरूरी होता है.

 

केवड़ा की रोपाई शाम में की जाए तो अच्छा रहता है. शाम को तापमान कम रहता है. यह फसल की बढ़वार के लिए अच्छा माना जाता है.

रोपाई के बाद नियमित पानी की जरूरत होती है. अगर बारिश हो रही है तो फिर सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती. बारिश नहीं होने की स्थिति में हर 8-10 दिन पर खेत में पानी चलाना जरूरी है.

 

केवड़ा के खेतों में खर-पतवार नहीं होता. यह एक सख्त पौधा है. इस कारण खेत खर-पतवार मुक्त होते हैं और निराई की जरूरत नहीं पड़ती.

अगर खाद की बात करें तो रोपाई के वक्त ही जैविक खाद खेत में डाल देना चाहिए. इससे पौधे की बढ़वार अच्छी होती है और आगे चलकर फूल भी सही से लगते हैं. इनकी पत्तियों में कीट लग जाते हैं. उसके लिए किसान समय पर छिड़काव कर सकते हैं.

 

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