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गेहूँ की फसल में लगने वाले रोग एवं उनका नियंत्रण

रोग एवं उनका नियंत्रण

 

गेंहू की फसल में कौन कौन से रोग लगते है एवं उनकी रोकथाम कैसे कर सकते है, जानें इस लेख में.

 

गेहूं, हमारे देश की प्रमुख खाद्यान्न फसल है। इसके साथ ही साथ यह देश की खाद्य सुरक्षा का आधार भी है।

आज देश में गेहूं की खेती लगभग 30 मिलियन हैक्टर क्षेत्रफल में की जाती है।

इससे लगभग 98.38 मिलियन टन (वर्ष 2017-18) गेहूं का उत्पादन होता है। भारत की जनसंख्या विश्व में दूसरे स्थान पर है।

 

पूरे देश के क्षेत्रफल व उत्पादन की दृष्टि से गेहूं रबी की सबसे महत्वपूर्ण फसल है।

इस समय देश में गेहूं की खेती मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड तथा मध्य प्रदेश में की जाती है।

देशभर में गेहूं की खेती लगभग 30 मिलियन हैक्टर क्षेत्रफल में की जाती है, जिससे लगभग 750 लाख टन गेहूं का उत्पादन होता है।

 

109 मिलियन टन गेहूं का उत्पादन

एक अनुमान के मुताबिक वर्ष 2020 तक देश की लगभग 135 करोड़ जनसंख्या के भरण-पोषण के लिए हमें लगभग 109 मिलियन टन गेहूं का उत्पादन करना होगा।

आज देश के कृषि वैज्ञानिकों ने आधुनिक शोध कार्यों एवं प्रयोगों द्वारा गेहूं की खेती को एक सुधरा एवं वैज्ञानिक रूप प्रदान किया है।

इससे गेहूं उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने के असीम अवसर उपलब्ध हो गए हैं।

 

रोग नियंत्रण से बढ़ेगी गेंहू की उपज

बदलती जलवायु मौसम के परिदृश्य में कृषि में उत्पादन एवं आय बढ़ाने की नवीनतम व समसामयिक तकनीकों को समझना और अपनाना जरुरी हो गया है।

वर्तमान में हमारे पास न सिर्फ गेहूं की उन्नत किस्में उपलब्ध हैं, बल्कि फसल को गेहूं का पीला रतुआ रोग विभिन्न रोगों से बचाने की रोगरोधी किस्में भी मौजूद हैं।

आज पूरे देश में गेहूं की प्रमुख महामारी रतुआ (रस्ट रोग) से इस फसल को बचाया और सुरक्षित रखा जा सकता है।

 

इसलिए जरूरी है फसल सुधार कार्यक्रमों द्वारा समय-समय पर दी गई रोग जानकारियों, पहचान, कारण एवं प्रबंधन के तरीकों को सही तरह से जानने, समझने और जानकारी से अनभिज्ञ किसानों को समझाने की।

यदि फसल की बुआई के समय ही गेहूं में लगने वाले रोगों की पहचान एवं नियंत्रण की जानकारी मिल जाए तो गेहूं के उत्पादन में निश्चित ही वृद्धि हो सकती है।

 

कई तरह के रोग

गेंहू की खड़ी फसल में बहुत से रोग लगते हैं,जैसे अल्टरनेरिया, गेरुई या रतुआ एवं ब्लाइट का प्रकोप होता है जिससे भारी नुकसान हो जाता है,

इसमे निम्न प्रकार के रोग और लगते हैं जैसे काली गेरुई, भूरी गेरुई, पीली गेरुई सेंहू, कण्डुआ, स्टाम्प ब्लाच, करनालबंट इसमें मुख्य रूप से झुलसा रोग लगता है,

पत्तियों पर कुछ पीले भूरे रंग के लिए हुए धब्बे दिखाई देते हैं, ये बाद में किनारे पर कत्थई भूरे रंग के तथा बीच में हल्के भूरे रंग के हो जाते हैं।

 

रोकथाम कैसे करें

इनकी रोकथाम के लिए मैन्कोजेब 2 किग्रा० प्रति हैक्टर की दर से या प्रापिकोनाजोल 25 % ई सी. की आधा लीटर मात्रा 1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए,

इसमे गेरुई या रतुआ मुख्य रूप से लगता है,गेरुई भूरे पीले या काले रंग के, काली गेरुई पत्ती तथा तना दोनों में लगती है।

इसकी रोकथाम के लिए मैन्कोजेब 2 किग्रा० या जिनेब 25% ई सी. आधा लीटर, 1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टर छिड़काव करना चाहिए।

यदि झुलसा, रतुआ, कर्नालबंट तीनो रोगों की संका हो तो प्रोपिकोनाजोल का छिड़काव करना अति आवश्यक है।

 

लगने वाले कीट

गेहूँ की फसल में शुरू में दीमक कीट बहुत ही नुकसान पहुंचता है इसकी रोकथाम के लिए दीमक प्रकोपित क्षेत्र में नीम की खली १० कुंतल प्रति हैक्टर की दर से खेत की तैयारी के समय प्रयोग करना चाहिए,

तथा पूर्व में बोई गई फसल के अवशेष को नष्ट करना अति आवश्यक है, इसके साथ ही माहू भी गेहूँ की फसल में लगती है।

ये पत्तियों तथा बालियों का रस चूसते हैं, ये पंखहीन तथा पंखयुक्त हरे रंग के होते हैं, सैनिक कीट भी लगता है पूर्ण विकसित सुंडी लगभग 40 मि०मी० लम्बी बादामी रंग की होती है।

यह पत्तियों को खाकर हानि पहुंचाती है, इसके साथ साथ गुलाबी तना बेधक कीट लगता है,

ये अण्डो से निकलने वाली सुंडी भूरे गुलाबी रंग की लगभग 5 मिली मीटर की लम्बी होती है, इसके काटने से फल की वानस्पतिक बढ़वार रुक जाती है।

 

कीट नियंत्रण

इन सभी कीट की रोकथाम के लिए कीटनाशी जैसे क्यूनालफास 25 ई सी. की 1.5-2.0 लीटर मात्रा 700-800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टर की दर से छिड़काव करना चाहिए,

या सैपरमेथ्रिन 750 मी०ली० या फेंवेलेरेट 1 लीटर 700-800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए।

कीटों के साथ साथ चूहे भी लगते हैं।

ये खड़ी फसल में नुकसान पहुँचाते हैं, चूहों के लिए जिंक फास्फाइट या बेरियम कार्बोनेट के बने जहरीले चारे का प्रयोग करना चाहिए,

समे जहरीला चारा बनाने के लिए 1 भाग दवा 1 भाग सरसों का तेल तथा 48 भाग दाना मिलाकर बनाया जाता है जो कि खेत में रखकर प्रयोग करते हैं।

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